जब नोटबंदी हुई फेल तो अपनी नाकामी छिपाने के लिए मोदी ने ब्लैक-टू-वाइट का रायता फैलाना शुरू किया.


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तो नोटबंदी का गोलपोस्ट शिफ्ट हो चुका है। ब्लैक मनी,आतंकवाद और जाली नोट के खिलाफ शुरू हुई जंग अब कैशलेश इकोनॉमी के बदलने की जंग में बदल चुकी है। काले को सफेद करने की स्कीम में बदल चुकी है।

मोदी सरकार के गोल पोस्ट शिफ्ट होने के तुरंत बाद उनके सपोर्टरों ने भी अब कैशलेश इकोनॉमी पर उपदेश को शिफ्ट कर दिया है। काला टू सफेद स्कीम का महत्व बताने में जुट गये हैं। कोई बुराई नहीं है कैशलेश इकोनॉमी में। काला-टू-सफेइ स्कीम में। एकदम होनी चाहिए। लेकिन उसके लिए पूरे देश में कोहराम मचाने की जरूरत नहीं थी। देश को कतार में खड़ा कर उनकी देशभक्ति की परीक्षा नहीं लेनी थी। यह तो बिना नोटबंदी के हो सकती थी।

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अब जब नोटबंदी पे अपनी नाक कटवाने के बाद मोदी ने खुलेआम ब्लैक-टू-वाइट का ड्रामा शुरू कर दिया है. Cartoon by Satish Acharya.

लेकिन गोल पोस्ट सरकार ने ऐसे ही शिफ्ट नहीं हुए। उसके पीछे सरकार की राजनीतिक मजबूरी थी। जब नोटबंदी स्कीम की शुरूआत की गयी तो कहा गया कि पांच लाख करोड़ तक ब्लैक मनी मिल सकता है। जिससे पूरे देश की तस्वीर बदल जाएगी। मतलब 14 लाख करोड़ के करेंसी में सरकार उम्मीद कर रही थी कि अधिकतम 9-10 लाख करोड़ सिस्टम में वापस लैटेगी। बाकी 5 लाख करोड़ को मोदीजी पूरे देश में ब्लैकमनी के रूप में प्रोजेक्ट करते। लेकिन रिजर्व बैंक के फिगर के अनुसार मात्र 28 नवंबर तक 9 लाख करोड़ वापस आ चुके हैं जबकि 31 मार्च तक जमा करने की मियाद है। अब रिजर्व बैंक संकेत दे रही है कि लगभग पूरा पैसा सिस्टम में वापस आ जाएगा। तो ब्लैकमनी कहां थी? जाली नोट कहां थे?
सरकार फंस गयी। पूरी कवायद सवालों के घेरे में आ गयी। उधर बैंकवाले,पुलिस वालों का बड़ा गिरोह 40 फीसदी में काला टू सफेद का खुल्ला खेल रहे थे। सरकार को भी भनक लगी। अंतत: सरकार ने सोचा कि जब काला पैसा सफेद होकर लौट ही रहा है तो उसका लाभ वही क्यों नहीं ले। बस आ गयी खुद अपनी लीगल काला-टू-सफेद स्कीम लेकर।
लेकिन इन सबके बीच मजबूती से सवाल पूछे जाने की जरूरत है कि जब यही सब करना था तो ऐसा रायता फैलने का अदुभुद आयडिया आया कहां से था?

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